बाँसुरी

पोटली भर आस लिएँ दो आँखें
चल पडी थी जाने कहाँ
आज बस स्टाप के नीचे है बैठी
कल तक था  एक पेड के नीचे उसका ठांव
कहते है पता बताने वाले ने लिखा था सिर्फ राह का ही नाम
मन्जिल बताता तो यह पहुँच नही जाती?
अब बैठी है सडक पर आँखें बिछायें
जाने कब से जाने कब तक
बचपन मे अम्मा की कही बात याद आ गई
एक टोकरी मे सामान लाद कर जब वह बापू के पास जाने लगती
तो अम्मा  कहती- अरी लाडो एक टोकरी मे सब मत डाल
गिर गया तो सब एक साथ बिखर जाएगा
पर अम्मा की भी कोई सुनता है भला
वह वैसे ही भागती और जोर से कहती
हाँ हाँ अम्मा अगली बार
और हंस के निकल जाती
आई थी अम्मा कल रात सपने मे
बोली बहुत सह चुकी लाडो
आ, मेरे पास आजा, देख तो बाल कितने रूखे हो गए है
पर अम्मा की…

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2 responses to this post.

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